मूंगफली की खेती 2026 लागत, उत्पादन, बाजार भाव और मुनाफा गाइड

प्रस्तावना: मूंगफली की खेती – कम लागत में सोने जैसा रिटर्न देने वाली फसल – Groundnut Cultivation – A Crop Yielding Gold-Like Returns at Low Cost

मूंगफली (Groundnut/Peanut) भारतीय कृषि व्यवस्था और मुख्य रूप से खरीफ सीजन की एक अत्यंत महत्वपूर्ण तिलहनी (Oilseeds) और नकदी फसल (Cash Crop) है। इसे “गरीबों का बादाम” भी कहा जाता है, क्योंकि इसमें 25 से 30 प्रतिशत उच्च गुणवत्ता वाला प्रोटीन, 48 से 50 प्रतिशत तक खाद्य तेल और प्रचुर मात्रा में विटामिन-ई, बी-कॉम्प्लेक्स और खनिज पाए जाते हैं। यही कारण है कि घरेलू बाजार से लेकर अंतरराष्ट्रीय बाजार और तेल मिलों में मूंगफली की मांग साल भर बहुत ऊंची बनी रहती है।

एक किसान के दृष्टिकोण से मूंगफली की खेती (Moongfali ki Kheti) दोहरे मुनाफे का सौदा है। मुख्य फसल से जहां हमें बहुमूल्य कंद (फलियां) प्राप्त होते हैं, वहीं इसका हरा/सूखा पाला (बनास्पति भाग) दुधारू पशुओं के लिए बेहद पौष्टिक और सुपाच्य चारे के रूप में काम आता है। इसके अतिरिक्त, मूंगफली एक दलहनी फसल होने के कारण इसकी जड़ों में मौजूद ग्रंथियां वायुमंडल की नाइट्रोजन को सोखकर मिट्टी में स्थिर करती हैं, जिससे अगली फसल के लिए खेत की कूर्वरा शक्ति प्राकृतिक रूप से बढ़ जाती है।

मूंगफली (Groundnut) भारत की प्रमुख तिलहनी फसलों में से एक है। इसे गरीबों का बादाम भी कहा जाता है क्योंकि इसमें प्रोटीन, तेल और पोषक तत्वों की भरपूर मात्रा होती है। मूंगफली का उपयोग खाद्य तेल, नमकीन उद्योग, मिठाई उद्योग, पशु आहार तथा निर्यात में किया जाता है।

भारत विश्व के प्रमुख मूंगफली उत्पादक देशों में शामिल है। गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु में मूंगफली की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है।

खाद्य तेल की बढ़ती मांग और कृषि तकनीकों में सुधार के कारण 2026 में मूंगफली की खेती किसानों के लिए एक लाभदायक विकल्प बन सकती है। यदि किसान सही किस्मों का चयन करें, संतुलित पोषण दें और रोग प्रबंधन पर ध्यान दें, तो प्रति एकड़ अच्छा उत्पादन लेकर लाभ कमा सकते हैं।

मूंगफली की खेती में अक्सर पारंपरिक तरीकों से खेती करने के कारण किसानों को प्रति एकड़ महज 4 से 5 क्विंटल ही पैदावार मिल पाती है। परंतु आधुनिक कृषि सिद्धांतों, सही बीज उपचार, एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन और वैज्ञानिक मशागत को अपनाकर इसे 12 से 15 क्विंटल प्रति एकड़ तक आसानी से पहुंचाया जा सकता है।

मूंगफली की खेती कैसे करें?

मूंगफली की खेती के लिए अच्छी जल निकासी वाली भूमि, उन्नत किस्मों का चयन, बीज उपचार, संतुलित उर्वरक प्रबंधन और समय पर रोग नियंत्रण आवश्यक है। आधुनिक तकनीक अपनाने पर किसान प्रति एकड़ 12–15 क्विंटल तक उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं और अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं।

१. जलवायु, उपयुक्त तापमान और मिट्टी का रसायन शास्त्र

मूंगफली मूल रूप से उष्ण (Tropical) और उपोष्ण (Sub-tropical) जलवायु का पौधा है। इसकी बेहतर बढ़वार और अधिकतम उत्पादन के लिए एक विशिष्ट भौगोलिक और रासायनिक परिवेश की आवश्यकता होती है।

  • तापमान की आवश्यकता: मूंगफली के बीजों के अच्छे अंकुरण (Germination) के लिए मिट्टी का तापमान न्यूनतम 20 से 25 डिग्री सेल्सियस होना चाहिए। पौधे की वानस्पतिक वृद्धि के समय 24 से 33 डिग्री सेल्सियस का तापमान सबसे आदर्श माना जाता है। फलियां पकने के समय तेज धूप और हवा में कम नमी (शुष्कता) होने से दानों का आकार बड़ा और चमकदार बनता है।
  • मिट्टी का चयन (Soil Selection): चूंकि मूंगफली की फलियों का विकास पूरी तरह से जमीन के अंदर होता है, इसलिए मिट्टी का चयन सबसे नाजुक कदम है। इसके लिए अच्छे जल निकास वाली, हल्की बलुई दोमट (Sandy Loam), भुरभुरी और मऊ माटी सर्वोत्तम होती है। ऐसी मिट्टी में हवा का संचार अच्छा होता है, जिससे सुइयां (Pegs) बिना किसी अवरोध के जमीन में आसानी से प्रवेश कर जाती हैं।
  • कैसी मिट्टी में खेती न करें?: अत्यधिक भारी, कठोर, जलभराव वाली काली मिट्टी और चोपण (Alkaline) भूमि मूंगफली के लिए बिल्कुल अनुपयुक्त है। भारी मिट्टी सूखने पर पत्थर जैसी सख्त हो जाती है, जिससे फलियों का विकास रुक जाता है और खुदाई के समय आधी से ज्यादा फलियां जमीन के अंदर ही टूट कर छूट जाती हैं।
  • पीएच (pH Value): भूमि का सामू (pH) 6.5 से 7.5 के बीच होना चाहिए। चूना युक्त (High Limestone) मिट्टी से बचें, क्योंकि ऐसी मिट्टी में लोहे (Iron) की कमी हो जाती है, जिससे पौधे पीले पड़ जाते हैं (जिसे आयरन क्लोरोसिस या चूनाळ रोग कहते हैं)।

२. खेत की तैयारी और सरे-आर्ट मशागत

मूंगफली की खेती के लिए खेत जितना भुरभुरा और मुलायम होगा, फलियों की संख्या उतनी ही अधिक होगी। इसलिए ग्रीष्मकालीन जुताई से लेकर अंतिम तैयारी तक विशेष ध्यान दें:

  • गहरी जुताई: मार्च-अप्रैल के महीनों में मिट्टी पलटने वाले हल या तवेदार कल्टीवेटर से खेत की एक गहरी खड़ी-आड़ी जुताई करें। इससे मिट्टी में छिपे हुए हुमणी कीट (White Grub) के अंडे, प्यूपा और हानिकारक बुरशी (Fungus) के बीजाणु तेज धूप से नष्ट हो जाते हैं।
  • भुरभुरी मिट्टी का निर्माण: जून के पहले सप्ताह में या मानसून की पहली बौछार के बाद खेत में रोटावेटर या कल्टीवेटर चलाकर ढेलों को पूरी तरह बारीक कर लें। पाटा चलाकर खेत को समतल करें ताकि कहीं भी पानी जमा न हो।
  • सेंद्रिय खाद (Organic Manure): अंतिम जुताई के समय प्रति एकड़ 5 से 6 टन अच्छी तरह से सड़ी हुई गोबर की खाद (FYM) या केंचुआ खाद (Vermicompost) पूरे खेत में समान रूप से बिखेर कर मिला दें। गोबर की खाद के साथ प्रति एकड़ 100 किलोग्राम नीम की खली (Neem Cake) मिलाना बेहद फायदेमंद होता है, क्योंकि यह जमीन के अंदर रहने वाली दीमक और हुमणी अळी से फसल की रक्षा करती है।
  • खेती के आधुनिक निर्णयों के लिए आप [भारत विस्तार AI ऐप क्या हैकिसानों के लिए खेती में क्रांति लाने वाला स्मार्ट ऐप] का उपयोग कर सकते हैं, जो आपको कीटों की पहचान और दवाइयों की सटीक जानकारी आपके मोबाइल पर देता है।

खरीप मूंगफली की शीर्ष प्रगत और उन्नत किस्में (Top Groundnut Varieties 2026)

मूंगफली की खेती में मुख्य रूप से दो प्रकार की किस्में होती हैं: 1. गुच्छेदार (Upright/Bunch Type – जो सीधी बढ़ती हैं और कम फैलती हैं) और 2. फैलने वाली (Spreading/Semi-spreading Type – जो जमीन पर फैलती हैं)। खरीफ सीजन के लिए मुख्य रूप से गुच्छेदार किस्मों की सिफारिश की जाती है, क्योंकि इनकी खुदाई आसान होती है।

किस्म का नामप्रकारपरिपक्वता अवधि (दिन)औसत पैदावार (प्रति एकड़)तेल की मात्रा (%)मुख्य विशेषताएं और लाभ
टीएजी-24 (TAG-24)गुच्छेदार105 – 110 दिन10 से 12 क्विंटल48 %पूरे भारत में सबसे लोकप्रिय। कम समय में तैयार, फलियां पौधे के तने के पास गुच्छे में चिपक कर बैठती हैं।
टीजी-37 ए (TG-37 A)गुच्छेदार110 – 115 दिन12 – 14 क्विंटल48.5 %भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) द्वारा विकसित। दाने काफी बड़े और चमकदार होते हैं, प्रतिकूल मौसम के प्रति सहनशील।
फूल प्रगति (JL-24)गुच्छेदार95 – 100 दिन9 से 11 क्विंटल50.6 %बेहद कम समय में पकने वाली किस्म। कम वर्षा वाले क्षेत्रों या सूखा प्रवण इलाकों के लिए वरदान।
फूल मोरणा (JL-501)गुच्छेदार105 – 110 दिन12 से 15 क्विंटल49 %पानावरील टिक्का (Leaf Spot) और तांबेरा (Rust) जैसे प्रमुख फंगल रोगों के प्रति अत्यधिक प्रतिरोधी।
फूल उन्हाळी (JL-220)गुच्छेदार110 – 115 दिन13 से 16 क्विंटल51 %खरीफ और समर दोनों सीजन के लिए सर्वश्रेष्ठ। इसकी फलियों में दो दाने पूरे अंत तक गच्च भरे होते हैं।
कादरी लेपाक्षी (K6)अर्ध-फैलने वाली112 – 118 दिन14 से 17 क्विंटल49.5 %भारी पैदावार देने वाली आधुनिक किस्म। सूखे की स्थिति में भी इसका पौधा हरा-भरा रहता है।

 

३. उच्च गुणवत्ता वाले बीज का चयन और वैज्ञानिक ‘द्वि-स्तरीय’ बीज उपचार

मूंगफली में कुल लागत का एक बड़ा हिस्सा बीज पर खर्च होता है, इसलिए बीज का चुनाव और उसकी सुरक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण है। हमेशा प्रमाणित स्रोतों से ही बीज खरीदें। यदि आप घर का बीज इस्तेमाल कर रहे हैं, तो बुवाई से मात्र 4-5 दिन पहले ही हाथों से मूंगफली की फलियों को छीलकर दाने अलग करें। मशीन से छीलने पर दानों के अंकुरण वाले हिस्से (Embryo) को चोट पहुंच सकती है। छीलने के बाद सुकड़े, छोटे, टूटे या कीड़े लगे दानों को अलग कर दें और केवल स्वस्थ, टपोर दानों को ही बुवाई के लिए रखें।

मूंगफली के लिए सटीक द्वि-स्तरीय बीज उपचार (Two-Step Seed Treatment Process):

बीज जनित रोगों जैसे कॉलर रॉट (Collar Rot), जड़ गलन (Root Rot) और शुरुआती कीटों से बचाव के लिए दो चरणों में उपचार करना अनिवार्य है:

  • चरण 1: रासायनिक बुरशीनाशक उपचार (Fungicide Treatment):

सबसे पहले प्रति किलोग्राम मूंगफली के बीज में 2 से 3 ग्राम थाइरम या मैनकोज़ेब, या 2 ग्राम कार्बेन्डाज़िम (या एडवांस में ‘कारबॉक्सिन + थाइरम’ का मिक्स) मिलाकर हल्के हाथ से सूखा चोड़ें। इससे दानों के ऊपर एक सुरक्षा कवच बन जाता है जो मिट्टी में मौजूद कवक से बीज को सड़ने नहीं देता।

  • चरण 2: जैविक जीवाणु संवर्धक उपचार (Biological Treatment):

रासायनिक उपचार के लगभग 3 से 4 घंटे बाद (यानी बुवाई के ठीक आधे घंटे पहले), प्रति किलोग्राम बीज के लिए 25 ग्राम राइजोबियम कल्चर (Rhizobium) और 25 ग्राम पीएसबी (PSB – फॉस्फोरस सॉल्युबिलाइजिंग बैक्टीरिया) लें। इसे थोड़े से गुनगुने पानी और गुड़ के ठंडे गाढ़े घोल में मिलाकर बीजों पर हल्के हाथों से लेप करें। इसके बाद बीजों को 20 मिनट के लिए छाया में सुखाएं और तुरंत बुवाई करें।

  • वैज्ञानिक लाभ: राइजोबियम जड़ों पर गाठें बनाकर हवा की नाइट्रोजन पौधे को देता है और पीएसबी मिट्टी में फिक्स पड़े फॉस्फोरस को घोलकर जड़ों तक पहुंचाता है।

४. मूंगफली की खेती में बुवाई का समय, सटीक दूरी और प्रति एकड़ बीज की मात्रा

मूंगफली की खेती 2026 में खेत में खड़ा किसान

  • बुवाई का सही समय: खरीफ मूंगफली की बुवाई हमेशा मानसून के पूरी तरह सक्रिय होने पर करें। जब खेत में अच्छी नमी हो (साधारणतः 15 जून से 15 जुलाई), तब बुवाई पूरी कर लें। 20 जुलाई के बाद की गई देर से बुवाई में वानस्पतिक वृद्धि कम होती है, फूल कम आते हैं और कटाई के वक्त परती का मानसून फसल को खराब कर देता है।
  • बीज दर (Seed Rate): गुच्छेदार (Upright) किस्मों के लिए प्रति एकड़ 35 से 40 किलोग्राम साफ दानों की आवश्यकता होती है। फैलने वाली किस्मों के लिए 30 से 32 किलो बीज पर्याप्त होता है।
  • दूरी (Spacing):
    • गुच्छेदार किस्मों के लिए: कतार से कतार (लाइन) की दूरी 30 सेंटीमीटर (1 फीट) और पौधे से पौधे की दूरी 10 सेंटीमीटर रखें।
    • बीजों को मिट्टी में 5 सेंटीमीटर से अधिक गहरा न बोएं, अन्यथा अंकुर को बाहर आने में बहुत ऊर्जा खर्च करनी पड़ती है और अंकुरण प्रतिशत घट जाता है।
  • बुवाई की आधुनिक तकनीक (BBF Method – Broad Bed Furrow):

मूंगफली की खेती के लिए पारंपरिक ट्रैक्टर पाभर (सीड ड्रिल) की तुलना में रुंद वरंबा-सरी (Broad Bed Furrow – चौड़ी पट्टी और नाली) विधि सबसे क्रांतिकारी साबित हुई है। इसमें ट्रैक्टर चालित मशीन द्वारा 3 से 4 फीट चौड़े बेड (उठे हुए बेड) बनाए जाते हैं और दोनों तरफ नालियां छोटी जाती हैं। बेड पर मूंगफली की 4 कतारें बोई जाती हैं।

  • बीबीएफ के लाभ: अत्यधिक बारिश होने पर नालियों से पानी बाहर निकल जाता है (Waterlogging नहीं होती), और यदि सूखा पड़े तो इन्हीं नालियों में स्प्रिंकलर या हल्का पानी चलाकर नमी बनाए रखी जा सकती है। इससे मिट्टी हमेशा भुरभुरी रहती है और फलियों का विकास 25% अधिक होता है।

मूंगफली की खेती का वैज्ञानिक खाद प्रबंधन (Balanced Fertilizer Schedule per Acre)

चूंकि मूंगफली एक तेलहनी (Oilseed) फसल है, इसलिए इसे केवल यूरिया या नाइट्रोजन की जरूरत नहीं होती, बल्कि इसे स्फुरद (Phosphorus), गंधक (Sulphur) और कैल्शियम (Calcium) की सबसे अधिक आवश्यकता होती है। तेल की मात्रा और छिलके की मोटाई पूरी तरह इन्हीं तत्वों पर निर्भर करती है।

खाद का चरणदेने का सही समयखाद का नाम और प्रति एकड़ मात्रामुख्य वैज्ञानिक उद्देश्य
आधारभूत डोस (Basal Dose)बुवाई के समय (मिट्टी में मिलाकर)1 बैग डीएपी (DAP – 50 किलो) + 1 बैग सिंगल सुपर फॉस्फेट (SSP – 50 किलो) + 20 किलो म्युरेट ऑफ पोटाश (MOP)प्रारंभिक अवस्था में जड़ों की गहराई बढ़ाना, तने को मजबूती देना और पौधों को शुरुआती पोषण देना।
सल्फर डोस (Essential)बुवाई के समय10 किलोग्राम दानेदार सल्फर (Sulphur 90% DG)सल्फर मूंगफली के दानों में तेल की मात्रा (Oil Content) को बढ़ाता है और दानों को वजनदार बनाता है।
जिप्सम का मास्टर स्ट्रोक (Most Vital)बुवाई के 40 से 45 दिन बाद (फूल आने के बाद जब सुइयां मिट्टी में घुस रही हों)100 किलोग्राम जिप्सम (Gypsum)जिप्सम में प्रचुर मात्रा में कैल्शियम और सल्फर होता है। यह सुइयों को आसानी से जमीन में धंसने में मदद करता है और फलियों को गच्च भरता है, जिससे ‘पोचट’ फलियां नहीं बनतीं।

५. मूंगफली की खेती का सिंचाई प्रबंधन: क्रांतिक अवस्थाएं और सुरक्षा तंत्र

मूंगफली फसल में पाणी और पोषण प्रबंधन

मूंगफली की खेती में खरीफ सीजन में मूंगफली मुख्य रूप से वर्षा जल पर निर्भर करती है। लेकिन अगर मानसून के दौरान लंबे समय तक सूखा पड़ता है या बारिश में 15-20 दिनों का खंड आता है, तो फसल को बचाने के लिए कृत्रिम सिंचाई की व्यवस्था करनी होगी। मूंगफली के जीवन चक्र में 3 ऐसी क्रांतिक अवस्थाएं (Critical Stages) हैं, जब खेत में नमी का होना अनिवार्य है:

  1. फूल आने की अवस्था (Flowering Stage): बुवाई के 25 से 30 दिन बाद। इस समय नमी कम होने पर फूल सूखकर गिर जाते हैं।
  2. सुइयां (पेग्स) बनने की अवस्था (Pegging Stage): बुवाई के 40 से 50 दिन बाद। इस समय मिट्टी का मुलायम और नम होना बेहद जरूरी है ताकि नाजूक सुइयां आसानी से जमीन के अंदर जा सकें।
  3. फलियों में दाना भरने की अवस्था (Pod Development): बुवाई के 70 से 85 दिन बाद। इस अवस्था में सूखे का सीधा असर दानों के आकार पर पड़ता है; दाने सुकड़ जाते हैं।
  4. सिंचाई की उत्तम विधि: मूंगफली में कभी भी बाढ़ कृत (Flood Irrigation/खेत भरकर) सिंचाई न करें। हमेशा स्प्रिंकलर (तुषार सिंचन) विधि का प्रयोग करें। स्प्रिंकलर से पानी की बचत होती है और मिट्टी की ऊपरी सतह सख्त नहीं होती, जो मूंगफली के लिए आदर्श है।
  5. आज के दौर में कोई भी फसल हो सिंचाई बिना सफल नही हो सकती, सिंचाई को विस्तृत समझने के लिएं [ड्रिप सिंचाई के फायदे: कम पानी में अधिक उत्पादन का रहस्य 2025] इस लेख को अवश्य पढे.

६. अंतः मशागत (Intercultivation) और सबसे बड़ा ‘पेगिंग स्टेज’ का नियम

मूंगफली की खेती में फसल शुरुआती 35 दिनों तक खरपतवारों (Weeds) के प्रति बहुत संवेदनशील होती है। तनों और खरपतवारों के बीच प्रतियोगिता के कारण पौधों की बढ़त रुक जाती है। इसके नियंत्रण के लिए:

  • बुवाई के 20 दिन बाद खेत में पहली हल्की कोड़पी/कोळपणी (निराई) करें और 32-35 दिन बाद दूसरी निराई करें।

मूंगफली की खेती के लिए अति-महत्वपूर्ण तकनीकी नियम (क्रिटिकल वार्निंग):

मूंगफली की खेती में बुवाई के 40 से 45 दिन बाद जब पौधे पर पिवळे (पीले) फूल गिर जाते हैं, तो वहां से सुइयां (Pegs) निकलकर नीचे मिट्टी की ओर बढ़ती हैं और जमीन के अंदर जाकर फलियां बनाना शुरू करती हैं। जैसे ही खेत में सुइयां जमीन के अंदर प्रवेश करने लगें, वैसे ही खेत में खुरपी, कुदाल, कोड़पी या ट्रैक्टर चलाना पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दें। इस दौरान यदि मजदूर खेत में खरपतवार निकालने के लिए घुसेंगे या कोई औजार चलाएंगे, तो मिट्टी के अंदर जा रही नाजूक सुइयां कट जाएंगी, जिससे फलियां नहीं बनेंगी और आपकी कुल पैदावार सीधे आधी रह जाएगी।

७. एकीकृत कीट और रोग प्रबंधन (Comprehensive Pest & Disease Control)

1. हुमणी कीट / सफेद लट (White Grub):

  • लक्षण और क्षति: यह खरीफ मूंगफली का सबसे विनाशकारी और भयानक कीट है। इसकी सफेद रंग की इल्लियां (Grubs) जमीन के अंदर छिपी रहती हैं और मूंगफली की मुख्य जड़ को पूरी तरह से नीचे से कुतर डालती हैं। नतीजा यह होता है कि खेत के खेत खड़े पौधे सूखने लगते हैं और उन्हें हाथ से खींचने पर वे बिना किसी जोर के बाहर आ जाते हैं।
  • सटीक नियंत्रण:
    • जैविक: खेत की तैयारी में निंबोळी पेंड (नीम केक) का इस्तेमाल करें।
    • रासायनिक: लक्षण दिखते ही प्रति एकड़ 6 किलोग्राम फिप्रोनिल 0.3% GR’ (Fipronil) दानेदार कीटनाशक को सूखी रेत या खाद में मिलाकर गीले खेत में डालें, या फिर ‘क्लोरपायरीफॉस 20% EC’ 500 मिली प्रति एकड़ की दर से पानी के साथ जमीन में ड्रेंचिंग करें।

2. टिक्का रोग / पर्ण चित्ती (Tikka Leaf Spot Disease):

  • लक्षण: यह मूंगफली का सबसे मुख्य बुरशीजन्य (Fungal) रोग है। बुवाई के 50-60 दिन बाद पत्तियों पर छोटे, गोलाकार, गहरे कत्थई या काले रंग के धब्बे दिखाई देते हैं, जिनके चारों ओर पीला घेरा होता है। उग्र अवस्था में पत्तियां पूरी तरह जलकर समय से पहले गिर जाती हैं, जिससे प्रकाश संश्लेषण रुक जाता है।
  • सटीक नियंत्रण: रोग के शुरुआती लक्षण दिखते ही कार्बेन्डाज़िम 12% + मैनकोज़ेब 63% WP’ (साफ बुरशीनाशक) 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर फंगल स्प्रे करें। यदि रोग गंभीर हो, तो टेब्यूकोनजोल 25.9% EC’ (Folicur) 1 मिली प्रति लीटर पानी के हिसाब से 12 दिनों के अंतराल पर दो स्प्रे करें।
  • कीट एवं रोग नियंत्रण के बारे मी सविस्तर जानकारी के लिएं हमारा लेख [कीट प्रबंधन 2025 सफल खेती के लिए एकीकृत तकनीक और सरकारी योजनाएँ] अवश्य पढे.

3. तांबेरा / गेरूई रोग (Rust Disease):

  • लक्षण: पत्तियों की निचली सतह पर छोटे, उभरे हुए तांबे जैसे या नारंगी-भूरे रंग के दानेदार पुस्ट्यूल्स (पुड़के) बन जाते हैं। हाथ लगाने पर उंगलियों में जंग जैसा पाउडर चिपक जाता है।
  • सटीक नियंत्रण: इसके नियंत्रण के लिए प्रोपिकोनाजोल 25% EC’ (Tilt/Bumper) 1 मिली प्रति लीटर पानी में मिलाकर पूरे पौधे पर अच्छी तरह छिड़काव करें।

4. रस चूसक कीट (माहू/Aphids, थ्रिप्स, जेसिड्स):

  • लक्षण: ये छोटे कीट कोमल पत्तियों और कलियों का रस चूसते हैं, जिससे पत्तियां मुड़ जाती हैं और पौधा कप के आकार का हो जाता है। इसके अलावा माहू कीट मूंगफली में ‘रोजेट वायरस’ (Rosette Disease) फैलाता है, जिससे पौधा झाड़ीदार और बौना रह जाता है।
  • सटीक नियंत्रण: इसके नियंत्रण के लिए इमिडाक्लोप्रिड 17.8% SL’ 0.5 मिली या थायमेथोक्सम 25% WG’ 0.5 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर साफ मौसम में स्प्रे करें।

८. खुदाई (काठणी), फलियां अलग करना, सुखाना और भंडारण

मूंगफली की फसल की कटाई करते किसान

मूंगफली की खेती में सही समय पर खुदाई न करने से फलियां मिट्टी के अंदर ही दोबारा अंकुरित होने लगती हैं या सड़ जाती हैं।

  • परिपक्वता की पहचान: जब पौधे की मुख्य पत्तियां पीली पड़ने लगें और निचली पत्तियां सूखकर गिरने लगें, तो समझें फसल तैयार है। अचूक जांच के लिए खेत से 3-4 पौधे उखाड़ें और फलियों को तोड़कर देखें। यदि फलियों के छिलके का अंदरूनी हिस्सा काला या गहरा कत्थई हो गया है, तो फसल पूरी तरह पक चुकी है। यदि अंदर का हिस्सा सफेद या गुलाबी है, तो फसल अभी कच्ची है।
  • खुदाई व थ्रेशिंग: मूंगफली की खेती में हल्की नमी होने पर पौधों को उखाड़ लें (हैंड पुलिंग या ट्रैक्टर हार्वेस्टर से)। उखाड़े गए पौधों को खेत में ही 3 से 4 दिनों तक छोटी ढेरियों में सुखाएं ताकि पत्तियां और बेलें थोड़ी कड़क हो जाएं। इसके बाद ग्राउंडनट थ्रेशर (मूंगफली निकालने वाली मशीन) की मदद से फलियों को बेल से अलग कर लें।
  • सुखाना (Curing) और भंडारण: अलग की गई फलियों को पक्के फर्श या तिरपाल पर कड़क धूप में 5 से 7 दिनों तक सुखाएं। जब फलियों को हाथ में लेकर हिलाने पर अंदर के दाने खड़खड़ाने लगें (यानी दानों में नमी का स्तर 8 से 9 प्रतिशत तक आ जाए), तब उन्हें जूट के बोरों में भरकर सूखे गोदामों में रखें।
  • नोट: यदि फलियां गीली रह गईं, तो उनमें ‘एस्परजिलस फ्लेवस’ बुरशी लग जाएगी, जिससे ‘अफ़्लाटॉक्सिन’ (Aflatoxin) नामक भयंकर विष पैदा होता है, जिससे दाने कड़वे हो जाते हैं और बाजार में कोई उन्हें नहीं खरीदता।

९. आर्थिक विश्लेषण: मूंगफली की खेती का प्रति एकड़ खर्च और शुद्ध मुनाफा

(यह वित्तीय विश्लेषण सन 2026 के वर्तमान इनपुट कॉस्ट और बाजार भाव के आंकड़ों के आधार पर तैयार किया गया है).

मूंगफली की खेती का अनुमानित प्रति एकड़ लागत (Cost of Cultivation):

  1. खेत की गहरी जुताई, रोटावेटर और समतलीकरण: ₹ 4,500/-
  2. उन्नत प्रमाणित बीज (38 किलो @ ₹120/किलो): ₹ 4,560/-
  3. बीज उपचार (रासायनिक व जैविक बुरशीनाशक): ₹ 450/-
  4. रासायनिक खाद, सल्फर, गोबर खाद और जिप्सम डोस: ₹ 8,500/-
  5. बुवाई मजूर या ट्रैक्टर सीड ड्रिल किराया: ₹ 2,500/-
  6. कीटनाशक और फफूंदनाशक दवाओं का खर्च (दो स्प्रे): ₹ 3,200/-
  7. खुदाई, फलियां तोड़ना और थ्रेशर मशीन का खर्च: ₹ 9,500/-
  8. परिवहन, बारदाना और अन्य फुटकर खर्च: ₹ 1,500/-
  9. कुल प्रति एकड़ खर्च: लगभग ₹ 34,710/-

अनुमानित प्रति एकड़ आय (Gross Income) और शुद्ध लाभ (Net Profit):

  • फलियों की पैदावार: यदि किसान ने बीबीएफ विधि और जिप्सम का सही इस्तेमाल किया है, तो सिंचित या अच्छे मानसूनी क्षेत्रों में प्रति एकड़ 12 से 15 क्विंटल सूखी फलियों की पैदावार आसानी से मिलती है। हम यहां औसतन 13 क्विंटल उत्पादन मान लेते हैं।
  • चारे की पैदावार (सूखा पाला): फलियों के साथ-साथ लगभग 1.5 टन (15 क्विंटल) अत्यंत पौष्टिक सूखा चारा प्राप्त होता है।
  • बाजार मूल्य (2026 की स्थिति): वर्तमान में अच्छी गुणवत्ता वाली सूखी मूंगफली का मंडी भाव ₹ 6,800 से ₹ 7,600 प्रति क्विंटल के बीच चल रहा है। हम न्यूनतम ₹ 7,000 प्रति क्विंटल का भाव मानकर चलते हैं।
  • फलियों से कुल आय: 13 क्विंटल x ₹ 7,000 = ₹ 91,000/-
  • सूखे चारे से आय: 1.5 टन चारा x ₹ 4,000 प्रति टन = ₹ 6,000/-
  • कुल ढोबळ आय (Gross Returns): ₹ 91,000 + ₹ 6,000 = ₹ 97,000/-
  • शुद्ध मुनाफा (Net Profit): कुल आय (₹ 97,000) – कुल खर्च (₹ 34,710) = ₹ 62,290/- प्रति एकड़ शुद्ध मुनाफा।

१०.Government & Research Links

1. ICAR – Indian Council of Agricultural Research

ICAR Official Website  भारत में कृषि अनुसंधान, उन्नत किस्मों और कृषि तकनीक के बारे में विश्वसनीय जानकारी।

2. ICAR – Indian Institute of Groundnut Research (IIGR)

ICAR-IIGR Groundnut Research मूंगफली की फसल के लिए अनुसंधान, उन्नत किस्में, उत्पादन तकनीक और सिफारिशें।

3. ICAR-IIGR Crop Production Technologies

Groundnut Crop Production Guide खरीफ़ की मूंगफली के लिए उठी हुई क्यारियों, मल्चिंग और पैदावार बढ़ाने के सुझाव।

4. All India Coordinated Research Project on Groundnut

AICRP Groundnut Program मूंगफली की बेहतर किस्मों, उत्पादन और सुरक्षा तकनीकों के बारे में जानकारी।

5. Vikaspedia – Oilseed Crops

Vikaspedia Oilseed Farming Resources तिलहनी फसलों के लिए उत्पादन तकनीक और कृषि संबंधी मार्गदर्शन।

FAQ: मूंगफली की खेती से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1.मूंगफली की खेती का सही समय क्या है?

जून–जुलाई।

2.प्रति एकड़ कितना बीज लगता है?

30–40 किलो।

3.मूंगफली का उत्पादन कितना होता है?

12–15 क्विंटल प्रति एकड़।

4.जिप्सम क्यों आवश्यक है?

फली विकास और उत्पादन बढ़ाने के लिए।

5.मूंगफली की खेती में कितना मुनाफा होता है?

₹50,000 से ₹75,000+ प्रति एकड़।

निष्कर्ष: वैज्ञानिक दृष्टिकोण ही बनाएगा मूंगफली को मुनाफे का सौदा – approach will make groundnut cultivation a profitable venture.

खरीफ सीजन 2026 में मूंगफली की खेती (Moongfali ki Kheti 2026) पारंपरिक ढर्रे से हटकर पूरी तरह वैज्ञानिक मापदंडों पर करने की आवश्यकता है। हवामान के बदलते मिजाज के बीच यह फसल किसानों के लिए एक ढाल की तरह काम करती है। सफलता की एकमात्र कुंजी यही है कि सही किस्म का चयन करें, बुवाई के समय सल्फर और 45 दिन पर जिप्सम का डोस कभी न भूलें, और पेगिंग स्टेज के दौरान खेत में कोई मशागत न करें। यदि आप इन नियमों का पालन करते हैं, तो आपकी लागत न्यूनतम होगी और मुनाफा अधिकतम।

यदि आप निरंतर लाभ देने वाले कृषि व्यवसायों के बारे में जानना चाहते हैं, तो इस लेख को अवश्य पढ़ें — [हल्दी की खेती 2026 लागत, उत्पादन और मुनाफा गाइड]

मूंगफली की खेती 2026 में किसानों के लिए एक लाभदायक और कम जोखिम वाली तिलहनी फसल साबित हो सकती है। सही किस्म, संतुलित पोषण, समय पर बुवाई और रोग प्रबंधन से किसान प्रति एकड़ अच्छा उत्पादन लेकर बेहतर आय प्राप्त कर सकते हैं। यदि किसान आधुनिक तकनीक और बाजार की जानकारी का उपयोग करें, तो मूंगफली की खेती से स्थायी और लाभदायक आय अर्जित की जा सकती है।

खेती-किसानी, नई फसलों की प्रगत तकनीकों और सरकारी योजनाओं की ऐसी ही सटीक, विस्तृत और प्रामाणिक जानकारी के लिए अपने भरोसेमंद वेब पोर्टल Shetkarimarg.com से हमेशा जुड़े रहें।

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